हौसला और जीवट

 


हर आँख में कुछ सपने होते हैं अरमान होते हैं आगे बढ़ने का जुनून होता कुछ पाने की ललक होती है और इसमें वो सफलता भी हासिल कर लेते हैं लेकिन कई बार हम सफल नहीं हो पाते या फिर उतने सफल नहीं हो पाते जितना हमने सोच रखा होता है तो क्या करना चाहिए? रुक जाना चाहिए? 
या अपने सपनों को तिलांजलि दे देनी चाहिए? तो क्या हमें समाज, और दुनिया को कोसना चाहिए या खुद को मार देना चाहिए ? 
इन सवालों में घिरा आज का युवा बहुत जल्दी घबरा जाता है 
बस यही सोच कई अनमोल जिंदगियों को निगलती जा रही है जिसमें आम इंसान से लेकर कामयाब लोग तक शामिल है लेकिन जीवन लीला समाप्त करने के बजाए हम ये क्यों न सोचे कि चुनौतियों से कैसे निपटे क्योंकि ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका अंत ना हो या समाधान न हो। माना कि सबकी समस्याएं अलग -२ होती है परंतु समाधान भी होता है किसी भी तर्क से आत्महत्या जैसे कुकृत्य को सही नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि मरने वाले अपने परिवार पर सवालिया निशान और स्वंय पर कायर होने का ठप्पा लगा जाते हैं । तो मैं एक घटना बताती हूँ कि कैसे एक लड़की के हिम्मत और साहस ने सब कुछ  बदल कर रख दिया  जिसे जान कर लगेगा कि इससे तो बहुत खुशकिस्मत  और लायक हैं हम ।
एक  माँ बाप की लापरवाही से उनकी बच्ची रोमा के एक पैर में पोलियो हो गया और वो बच्ची लंगड़ा कर चलने लगी, स्कूल में  बच्चे उसका मजाक बना रहे थे तो मुझे अच्छा नहीं लगा और मैने उसे दिलासा दिया और बच्चों की शिकायत शिक्षिका से कर दी उस दिन से हमारी दोस्ती हो गई और वो दिन मेरा पहला दिन था उस स्कूल में, वो रूँआसी होकर बोली अभी तुम्हें पता नहीं है ये सब मुझे सारे टाइम चिढा़ने के अलावा कुछ नहीं करते फिर मैंने उसे एहसास करवाया कि वो किसी से कम नहीं है। उसे हौसला देती  लेकिन मन ही मन मैं उसके पैर को लेकर दुखी रहती थी क्योंकि उसके परिवार वाले सदा उसे और अपनी किस्मत को कोसते रहते थे उसे बोझ समझते थे लेकिन उसकी तकलीफ कोई नहीं समझता था कि समाज उसे दयाभाव की नजर से देखता है और नकारा भी समझता है । समाज और घरवालों की उपेक्षित नजरों से रोमा टूटी नही बल्कि इन उपेक्षापूर्ण रवैये ने उसे और जीवंत तथा मजबूत बना दिया। वो समझ गई कि जब तक वो अपने पैरों पर खड़ी नहीं होगी समाज और घर में महत्वहीन ही रहेगी और इसी सोच ने उसे प्रेरित किया और संघर्ष करती हुई उसने दसवीं में द्वितीय स्थान हासिल किया और टयूशन करके आगे की पढ़ाई का खर्चा भी रोमा स्वयं निकालने लगी बारहवी पास कर सरकारी नौकरी में क्लर्क के लिए फार्म भरा जिसमें उसकी नौकरी लग गयी और अपनी पहली तनख्वाह से रोमा ने अपने लिए नकली पैर खरीदा और सदा - सदा के लिए अपने पैरों पर खड़ी हो गई। दयाभाव रखने वाले और उपेक्षित समझने वालों के लिए वो रातों रात प्रेरणा बन गई। जब रोमा जैसा इंसान इतना कुछ हासिल कर  सकता है तो आज का युवा क्यों नहीं ? जरूरत है सिर्फ हौसले और जीवट बनने की, यही हमें मंजिल तक पहुँचने में मदद कर सकता है इसलिए खुद को खत्म करने की कभी नहीं सोचना चाहिए  कुछ करना ही है तो खुद की एक पहचान बनाने की सोचो। कुछ करने की सोचों 
वीणा मिश्रा (  रत्ना )
स्वरचित ( मौलिक )

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