कोरोना #शायद हम भी दोषी

शायद हाँ ,कभी न कभी
और कहीं न कहीं
दुख पाइ है हमसे धरती ।
सजा पा रहे हम अपने किए की,
गुनाहगार है इसीलिए,
घर में बंद बीत रही हैं जिंदगी ।
काश सुन पाते अपने जमीर की  ,
वापस पा लेते जिंदगी नई ।
वीना मिश्रा (रत्ना)
स्वरचित


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